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वक्फ बिल पर लोकसभा-राज्यसभा में गरमाई सियासत: 8-8 घंटे की चर्चा, सरकार और विपक्ष आमने-सामने

वक्फ संशोधन विधेयक 2025 को लेकर देश की राजनीति में जबरदस्त हलचल मची हुई है। संसद में इस बिल पर 8-8 घंटे की लंबी चर्चा हो रही है। सरकार इसे मुस्लिम समुदाय की वक्फ संपत्तियों के बेहतर प्रबंधन का कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे असंवैधानिक करार दे रहा है।
वक्फ बिल पर लोकसभा-राज्यसभा में गरमाई सियासत: 8-8 घंटे की चर्चा, सरकार और विपक्ष आमने-सामने
वक्फ संशोधन विधेयक को लेकर देश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। सरकार ने इसे पारित कराने की पूरी तैयारी कर ली है, जबकि विपक्ष इसे असंवैधानिक करार देकर पुरजोर विरोध कर रहा है। संसद के दोनों सदनों, लोकसभा और राज्यसभा, में इस पर 8-8 घंटे की विस्तृत चर्चा निर्धारित की गई है। ऐसे में यह बिल राजनीतिक गर्मी का केंद्र बन चुका है।

सरकार का पक्ष: सुधार की जरूरत या सत्ता की रणनीति?

सरकार का दावा है कि यह विधेयक देश में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और प्रशासन में सुधार लाने के उद्देश्य से लाया गया है। उनका कहना है कि वर्तमान वक्फ अधिनियम में कई खामियां हैं, जिनका दुरुपयोग किया जाता रहा है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि "यह बिल मुस्लिम समुदाय के हितों की रक्षा करेगा और उनकी संपत्तियों के पारदर्शी प्रबंधन को सुनिश्चित करेगा।"

सरकार के इस रुख के बावजूद, विपक्ष इसे अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ एक सोची-समझी रणनीति करार दे रहा है। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि "यह विधेयक मुसलमानों के धार्मिक अधिकारों पर हमला है। बीजेपी सरकार इसके जरिए मुस्लिम समुदाय की संपत्तियों पर नियंत्रण स्थापित करना चाहती है।"

विपक्ष का आक्रोश: बिल को बताया असंवैधानिक

कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, और डीएमके जैसे विपक्षी दल इस विधेयक का खुलकर विरोध कर रहे हैं। लोकसभा में कांग्रेस नेता गौरव गोगोई ने आरोप लगाया कि "सरकार विपक्ष की आवाज दबा रही है और चर्चा के लिए पर्याप्त समय नहीं दे रही। विपक्ष चाहता है कि इस बिल पर अधिक विस्तृत बहस हो, जिसमें इसके संभावित प्रभावों का भी आकलन किया जाए।"

तृणमूल कांग्रेस के सांसद कल्याण बनर्जी ने कहा कि "यह विधेयक बीजेपी की सांप्रदायिक राजनीति का हिस्सा है। यह धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है और हम इसे किसी भी हालत में पास नहीं होने देंगे।" वहीं, राज्यसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसे "लोकतंत्र विरोधी कदम" बताया।

सत्ता पक्ष बनाम विपक्ष

लोकसभा में 542 सदस्यों में से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के 293 सांसद हैं, जबकि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की संख्या कम है। ऐसे में सत्ता पक्ष का पलड़ा भारी माना जा रहा है। हालांकि, टीडीपी, जेडीयू, और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) जैसे बीजेपी के सहयोगी दल शुरू में विधेयक के कुछ प्रावधानों से असहमत थे। लेकिन संसद की संयुक्त समिति द्वारा कुछ सुझावों को स्वीकार करने के बाद, इन दलों ने विधेयक का समर्थन करने का संकेत दिया है।

सरकार ने बीजेपी और एनडीए के अन्य घटक दलों को व्हिप जारी कर इस विधेयक के समर्थन में खड़े रहने का निर्देश दिया है। वहीं, विपक्षी दलों ने अपने सांसदों को इस बिल के खिलाफ आवाज उठाने के लिए तैयार रहने को कहा है। बीजेपी की ओर से अनुराग ठाकुर, रविशंकर प्रसाद, तेजस्वी सूर्या और निशिकांत दुबे इस पर सरकार का पक्ष रखेंगे, जबकि विपक्ष की तरफ से कांग्रेस के गौरव गोगोई, इमरान मसूद, और मोहम्मद जावेद इस पर अपनी बात रखेंगे। राज्यसभा में टीएमसी के मौसम नूर और नदीम, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव और इकरा चौधरी प्रमुख वक्ता होंगे।

वक्फ बोर्ड और मुस्लिम संगठनों का रुख

वक्फ बोर्ड और कई मुस्लिम संगठन इस विधेयक के खिलाफ एकजुट हो गए हैं। उनका कहना है कि यह विधेयक वक्फ संपत्तियों को सरकारी नियंत्रण में लाने की कोशिश है, जो धार्मिक आजादी के खिलाफ है।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इसे "सांप्रदायिक एजेंडा" करार दिया है और कहा कि "यह विधेयक मुसलमानों की धार्मिक संपत्तियों को हड़पने की कोशिश है।" वहीं, कुछ मुस्लिम विद्वानों का कहना है कि "सरकार को इस विधेयक पर पुनर्विचार करना चाहिए और मुस्लिम समुदाय से सलाह-मशविरा करके इसे लागू करना चाहिए।" वक्फ संशोधन विधेयक पर बहस के बाद इसका भविष्य तय होगा। चूंकि एनडीए के पास बहुमत है, इसलिए इसे पारित कराने में सरकार को कठिनाई नहीं होगी। लेकिन विपक्ष के विरोध को देखते हुए, यह साफ है कि संसद में आने वाले दिनों में राजनीतिक सरगर्मी चरम पर रहेगी।

वक्फ संशोधन विधेयक पर मचे घमासान से साफ है कि यह महज एक कानून नहीं, बल्कि राजनीति का एक बड़ा मुद्दा बन चुका है। एक तरफ सरकार इसे मुस्लिम समुदाय के हितों की रक्षा के लिए जरूरी बता रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इसे असंवैधानिक और मुस्लिम विरोधी करार दे रहा है। संसद में बहस के दौरान स्थिति और स्पष्ट होगी, लेकिन इतना तय है कि यह विधेयक आने वाले चुनावों में बड़ा मुद्दा बन सकता है।
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